दो ज़िंदगियों के बीच

 

हमारी ज़िंदगी दरअसल दो समानांतर रास्तों पर चलती है। एक वह ज़िंदगी, जिसे हम रोज़मर्रा की ज़रूरतों, जिम्मेदारियों और परिस्थितियों के बीच जीते हैं, और दूसरी वह ज़िंदगी, जो हमारे सपनों, इच्छाओं और उम्मीदों में बसती है। इन दोनों के बीच का अंतर ही हमारे भीतर एक अनकही बेचैनी पैदा करता है। बाहर से हम मुस्कुराते दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर कहीं न कहीं एक अधूरापन सा महसूस होता है। यही अधूरापन हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में वही जीवन जी रहे हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी।

कहते हैं, दिल के अरमान अक्सर आँसुओं में बह जाते हैं - और कई बार ऐसा सचमुच होता भी है। हम अपनी असली चाहतों को समाज की अपेक्षाओं और अपने डर के बोझ तले दबा देते हैं। कभी असफल होने का डर, तो कभी लोगों की राय का भय हमें पीछे खींच लेता है। धीरे-धीरे हम वही बनने लगते हैं, जो दुनिया हमसे चाहती है, न कि वह जो हम स्वयं बनना चाहते हैं। इस प्रक्रिया में हम अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं और अनजाने ही खुद से दूर होते चले जाते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है कि सपनों की ज़िंदगी केवल कल्पना नहीं होती। वह हमारे भीतर मौजूद उस सच्चे स्वरूप की आवाज़ होती है, जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहती है। यह आवाज़ कभी-कभी धीमी पड़ सकती है, लेकिन कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती। अगर हम साहस करें और छोटे-छोटे कदम उठाना शुरू करें, तो दोनों ज़िंदगियों के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम की जा सकती है। हर छोटा प्रयास, हर छोटा निर्णय हमें हमारी मनचाही ज़िंदगी के और करीब ले जाता है।

आख़िरकार, ज़िंदगी सिर्फ़ साँस लेने का नाम नहीं है, बल्कि अपने मन की सुनकर जीने का नाम है। जब हम अपनी चाही हुई ज़िंदगी की ओर बढ़ते|

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